कहते है जिसको प्यार हम, उसको क्या हम खाक समझते हैं |
जिस किसी पर भी हम मरते हैं, उसे ही मार कर रखते हैं ||
परेशां हैं तो क्या हुआ , आंसूं पोंछने को हम पास तो बेठे हैं |
दूर रहे खुश किसी और के साथ, यह न हम गवारा करते हैं ||
प्यार से लिए जा रहा है क़र्ज़, उसे खुश हम रखते हैं |
जो दिए उसने पैसे फेंकर, अब उससे रंजिश हम रखते हैं ||
हुए जब परेशां इस दुनिए से, खुदा के पास हम चलते हैं |
न लगा वहां भी दिल, वापिस इस दुनिया का रुख हम करते हैं ||
गर सोच लिया एक बार, तो हो कर रहेगा कुछ न कुछ |
न हुआ तो क्या हुआ, मन में ख्याल समझकर हम रखते हैं ||
क्या पता यह उससे सुना या दीमाग की मेरे ही खलिश हैं |
इसका हिसाब क्यूँ रखे , जब याद यह सब हम रखते हैं ||
Posted by dsodhi